रावण: एक असुर जिसकी बराबरी देवता भी न कर सके

भारतीय पौराणिक कथाएं अक्सर हमें कई बुद्धिमान पुरुषों और महिलाओं की कहानियां बताती हैं, जिनमें से कई सक्षम शासक और प्रशासक थे। ये पुरुष और महिलाएं अपने जीवन के शीर्ष पर पहुंचे, जिन्होंने देश के इतिहास और संस्कृति में एक अमिट छाप छोड़ी। हालाँकि, उनके पास बस एक छोटी सी असफलता थी, जो थी सफलता की ऊंचाइयों से प्राप्त मद की। इसी मद ने उनके पतन में अहम भूमिका निभाई। ऐसी ही है पराक्रमी रावण की कहानी, लंका के महान शासक की।

रामायण भी इस शक्तिशाली राजा के बारे में ज्यादा नहीं बताती है। रावण एक राक्षस (असुर या दानव) के रूप में पैदा हुआ था, परन्तु वह एक प्रतिभाशाली प्रतिष्ठित विद्वान के रूप में उभरा एक महान संगीतकार था जो अपने कौशल के लिए जाना जाता है और जिसने तीनों लोकों पर सफलतापूर्वक शासन किया।भगवान शिव के भक्त रावण की जीवन कहानी वास्तव में प्रेरणादायक है। वह अब तक के सबसे शक्तिशाली शासकों में से एक था। वह देवताओं, राक्षसों और मनुष्यों पर अपनी बुद्धि और शक्ति से नियंत्रण के लिए जाना जाता था।

ऐसा माना जाता है कि रामायण के उद्भव से पहले भी उसने कई सौ वर्षों तक लंका पर शासन किया था। फिर भी, वाल्मीकि रामायण में रावण को नकारात्मक रूप में चित्रित किया गया है एक शक्तिशाली अत्याचारी के रूप में, जिसने बुरे काम किए और कई बार देवताओं को बंदी रखा। महाकाव्य के संस्करण में राम की पत्नी सीता के अपहरण के लिए उसका तिरस्कार किया जाता है। लेकिन ऐसा उसने राम और उनके भाई लक्ष्मण से प्रतिशोध लेने के लिए किया, क्योंकि उन्होंने उसकी बहन शूर्पणखा की नाक काट दी थी।

आइए अब हम रावण की कहानी की गहराई में उतरें और इस शक्तिशाली शासक के जीवन और समय के बारे में और जानें।

रावण का परिचय शास्त्रों में

रावण का जन्म एक महान ऋषि से हुआ था, रावण के पिता का नाम विश्रवा और माता का नाम कैकसी था, जो एक दैत्य (दानव) राजकुमारी थी। आज भी उत्तर प्रदेश ग्रेटर नोएडा के बिसरख गांव के निवासियों का दावा है कि उनके गांव का नाम विश्रवा के नाम पर रखा गया था और रावण का जन्म यहीं हुआ था।

“रावण” शब्द का अर्थ है “गर्जन” यह वैश्रावण के विपरीत है, जिसका अर्थ है “स्पष्ट रूप से सुनना”। रावण और वैश्रावण (कुबेर) दोनों विश्रवा के पुत्र हैं। रावण को अन्य नामों से भी संबोधित किया जाता है जैसे कि दशानन, रावुला, लंकेश्वर, लंकेश्वरन,दासिस रावण, महा रावण, रावणेश्वरन और ईला वेंधर।

रावण को अक्सर दस सिरों के साथ चित्रित किया जाता है। ये सिर उसके विशाल ज्ञान के प्रतीक हैं। वह चार वेदों और छह शास्त्रों पर उसकी महारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। वह अत्यंत बुद्धिमान, शक्तिशाली और महत्वाकांक्षी भी था। उसका प्रमुख लक्ष्य देवों (देवताओं) पर विजय प्राप्त करना और पूरे ब्रह्मांड पर पूर्ण नियंत्रण हासिल करना था।

ऐसा माना जाता है कि उसके पास अमरता का अमृत था, जिसे उसने सावधानी से अपने पेट में रखा था। यह एक वरदान था जो ब्रह्मांड के निर्माता भगवान ब्रह्मा से मिला था। इस वरदान के अनुसार, वह केवल तभी जीत सकता था जब कोई उसके पेट को छेदने और भीतर पड़े अमृत को नष्ट करने में कामयाब हो।

रावण को रावण संहिता (हिंदू ज्योतिष पर एक पुस्तक), अर्का प्रकाशम (सिद्ध चिकित्सा और उपचार पर एक पुस्तक) और आयुर्वेद पर सात अन्य पुस्तकों का लेखक माना जाता है। इसके अलावा, उसने सिद्ध और राजनीति विज्ञान पर भी पूरी तरह से महारथ हासिल की थी।

भारत के कुछ हिस्सों श्रीलंका और बाली में हिंदुओं द्वारा उसकी पूजा की जाती है। चूंकि वह भगवान शिव के सबसे बड़े भक्तों में से एक था, इसलिए वह कुछ स्थानों पर शिव से जुड़े होते हैं।

रावण से जुडी किवदंतिया

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कुछ जगह रावण को केवल नौ सिर वाला चित्रित किया गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि माना जाता है कि उसने भगवान शिव के प्रति अपनी भक्ति को प्रदर्शित करने के लिए एक सिर का बलिदान किया था। कुछ किंवदंतियों में यह माना जाता है कि रावण हर साल अपना एक सिर काटकर शिव को भेंट करता था। उसका प्रत्येक सिर एक प्रकार की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है।
एक सिर को काटकर और शिव को अर्पित करके वह अपनी एक इच्छा को भगवान महादेव के चरणों में समर्पित कर देता है।

रावण हर साल ऐसा करता रहा, जब तक कि उसका एक ही सिर नहीं रह गया। यह उसका असली सिर था। इसे ध्यान में रखते हुए और रावण की भक्ति से प्रसन्न होकर, शिव ने अंततः स्वीकार किया कि वह उनके सबसे महान भक्तों में से एक है। थाई पाठ में रामकियन रावण को यक्ष या राक्षस के रूप में चित्रित किया गया है। जैन धर्म में महाकाव्य रामायण में वर्णित घटनाएं २०वें तीर्थंकर मुनिसुव्रत के समय की मानी जाती हैं। इस संस्करण के अनुसार, राम और रावण दोनों धर्मनिष्ठ जैन थे। रावण एक विद्याधर राजा था जिसके पास कई जादुई शक्तियां थीं। यहाँ आम धारणा के विपरीत रावण का वध लक्ष्मण ने किया था न कि राम द्वारा।

रामायण में रावण का चित्रण

रामायण के अनुसार, रावण एक असुर (दानव) था, जो देवगण श्रेणी में पैदा हुआ था। उनके दादा ऋषि पुलस्त्य ब्रह्मा के दस प्रजापतियों या मानसपुत्रों (मन में जन्मे पुत्रों) में से एक थे-यह तकनीकी रूप से रावण को भगवान ब्रह्मा का परपोता बनाता है। ऋषि पुलस्त्य भी सप्तर्षियों या सात महान संतों में से एक थे। इस प्रकार रावण एक बहुत विशाल परिवार से था। उसके भाई-बहनों में विभीषण, कुंभकर्ण और अहिरावण शामिल थे और कुबेर उसके सौतेले भाई थे।

कुबेर ने मूल रूप से लंका पर शासन किया था। लेकिन रावण ने अंततः राज्य को जीत लिया और कई शताब्दियों तक रमणीय, सुंदर शहर पर शासन किया। लंका का निर्माण दिव्य वास्तुकार विश्वकर्मा ने किया था। कुबेर ने विश्रवा के साथ इस मामले पर चर्चा की उनसे अपने सौतेले भाई की मांगों को मानने का आग्रह किया। इस प्रकार कुबेर ने रावण को लंका दी और हिमालय चले गए।
हालाँकि रावण ने लंका पर अधिकार कर लिया था, लेकिन वह एक अच्छा और परोपकारी प्रशासक था। उसने बुद्धिमानी से शासन किया और अपनी प्रजा को हर समय खुश रखना सुनिश्चित किया।

उसके शासन काल में लंका का विकास हुआ। आखिरकार रावण मानव, देव और असुर राज्यों के खिलाफ युद्ध छेड़ने और उन्हें जीतने के लिए आगे बढ़ा। रामायण में कहा है कि रावण को भगवान राम ने तब मारा था जब राम ने अपनी पत्नी सीता के अपहरण के राक्षस के कृत्य का बदला लेने के लिए युद्ध किया था।

रावण का पतन

रावण का पतन सीता के स्वयंवर के समय से ही घटनाओं की एक श्रृंखला के साथ शुरू हुआ। जिस क्षण उसने सुंदर और दीप्तिमान कन्या सीता पर अपनी नजर डाली। उसकी पत्नी मंदोदरी के अलावा, उसके पास दुनिया की सबसे आकर्षक महिलाओं का एक पूरा हरम था फिर भी वह सीता को अपना बनाना चाहता था।

सीता का स्वयंवर

सीता के पिता जनक जो मिथिला के राजा थे, उन्हांेने अपनी बेटी के लिए एक भव्य स्वयंवर का आयोजन किया। समारोह में भाग लेने के लिए दूर-दूर से राजाओं और राजकुमारों को आमंत्रित किया। एक मंडप के अंदर एक शक्तिशाली धनुष रखा और घोषणा की कि वह अपनी बेटी को शादी में उसी को देंगे जो इस धनुष को उठाकर इस पर प्रत्यंचा चढ़ा पाएगा। यह धनुष साधारण नहीं था इसे स्वयं भगवान शिव ने आशीर्वाद स्वरूप दिया था। इसलिए केवल कोई विशेष ही जनक की शर्त को पूरा करने में सक्षम होता।
उपस्थित लोगों में से कई ने धनुष उठाने की कोशिश की लेकिन असफल रहे। फिर रावण की बारी थी।

अहंकारी दानव राजा को विश्वास था कि वह इसे सहजता से उठा पाएगा। वह लापरवाही से उसकी ओर बढ़ा और उपस्थित सभी लोगों से कहा कि वह इसे अपने बाएं हाथ से उठा लेगा। रावण को निराशा ही हाथ लगी, धनुष ने हिलने से इनकार कर दिया। फिर उसने दोनों हाथों से उसे उठाने की कोशिश की और फिर असफल रहा। कई बार कोशिशों के बाद भी यह सिलसिला जारी रहा। आखिरकार उसे हार माननी पड़ी और अपनी जगह पर वापस जाना पड़ा।

समारोह में राम और लक्ष्मण को भी आमंत्रित किया गया था। राम धनुष के पास गए उसे प्रणाम किया और फिर एक आसान रूप में धनुष को उठा लिया और प्रत्यंचा चढ़ाई जिसके बाद गड़गड़ाहट के साथ धनुष दो भागों में टूट गया। सीता राम के पास गईं और उन्हें वरमाला पहनाई। इस बीच प्रतियोगिता हारने से रावण भी इस बात से नाराज था कि सीता ने राम से शादी कर ली। उसने कसम खाई कि वह किसी दिन उसे अपना बना लेगा।

सूरपनखा का अपमान

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सूर्पनखा वाल्मीकि रामायण में एक और बहुत महत्वपूर्ण नकारात्मक चरित्र है। रावण की बहन वह इंडोनेशिया में सर्पकामका के रूप में, खमेर में सूर्पनखा के रूप में, मलेशिया में सुरपंडकी के रूप में और थाईलैंड सम्मनक्खा के रूप में। रामायण में, उसे एक विरूपी (बदसूरत, विकृत विशेषताओं के साथ) के रूप में वर्णित किया गया है। मोटा पेट, भेंगी आँखंे, एक कर्कश आवाज और पतले बालों के साथ। उसने राम को उनके वनवास के दौरान पंचवटी के जंगलों में घूमते हुए देखा। वह तुरंत उनके रूप और शरीर से प्रभावित हो गई और उन पर आगे बढ़ने लगी। वह उनके पास गई और उनसे शादी करने की इच्छा व्यक्त की।

राम ने यह कहते हुए मना कर दिया कि वह पहले से ही सीता से विवाहित हैं और उन्होंने एकपत्नी व्रत भी लिया है और उसे लक्ष्मण के पास जाने के लिए कहा। अनिच्छा से वह लक्ष्मण के पास गई और उनसे पूछा कि क्या वह उससे शादी करेगा तो लक्ष्मण ने भी कुछ इसी तरह की प्रतिक्रिया दी और कहा कि वह उसे कभी पत्नी के रूप में नहीं देख पाएंगे।

सूर्पनखा दोनों भाइयों से विनती करती रही और वे उसकी बात मानने से इनकार करते रहे और उसका मजाक भी उड़ाते रहे। क्रोधित और अपमानित होकर वह सीता पर हमला करने के लिए आगे बढ़ी। उसे लक्ष्मण ने रोक दिया और उसकी नाक काट दी और उसे वापस लंका जाने का आदेश दिया।

सूर्पणखा पहले अपने भाई खर के पास गई और उसे घटना के बारे में बताया। उसने एक पूरी सेना के साथ राजकुमारों पर हमला करने की कोशिश की। वह राम और लक्ष्मण के हाथों पराजित हुए वह फिर रावण के पास गई उससे अपनी दुर्दशा का बदला लेने के लिए कहा। अपनी प्रिय बहन को इस प्रकार पीड़ित देखकर क्रोधित होकर रावण ने फैसला किया कि वह राम और लक्ष्मण को अपनी मूर्खता का एहसास कराने के लिए सीता का हरण करेगा।

रावण द्वारा सीता का हरण

रावण ने अपने मामा मारीच को सोने के मृग का रूप धारण करने और जहां राम और सीता रह रहे थे वहां चलने के लिए कहा ताकि उसे लुभा सके। उसने एक सुंदर और उज्ज्वल सुनहरे मृग का रूप धारण किया। सीता तुरंत उस जानवर के प्रति आकर्षित हो गईं और उन्होंने राम से उसका पीछा करने और उसे अपने पास लाने का अनुरोध किया। राम को इस बारे में संदेह था लेकिन अपनी पत्नी की इच्छा को पूरा करने का फैसला किया।

जैसे ही राम ने हिरण का पीछा किया, वह जंगल में और दूर भाग गया। जब राम ने अंत में उसे पकड़ लिया और उस पर एक तीर चलाया, तो स्वर्ण मृग ने राम की आवाज में लक्ष्मण को पुकारा मदद मांगी। अपनी चोट के आगे घुटने टेकने से पहले मारीच ने अपना मूल रूप धारण कर लिया। अपने पति की आवाज सुनकर चैंक गई, सीता ने लक्ष्मण को अपने पति की तलाश में जाने का आदेश दिया। लक्ष्मण उन्हें वहाँ अकेला छोड़ने को तैयार नहीं थे। जब सीता ने जोर देकर कहा कि वह अपने भाई की मदद के लिए जाए, तो लक्ष्मण ने सीता को घर के अंदर रहने और बाहर न आने का अनुरोध किया। लक्ष्मण ने एक तीर लिया एक मंत्र बोला और घर के चारों ओर रेत में एक सुरक्षात्मक रेखा खींची। उन्होंने आश्वासन दिया कि जब तक वह इस लक्ष्मण रेखा के अंदर रहंेगी तब तक वह पूरी तरह से सुरक्षित रहंेगी फिर वह अपने भाई राम की मदद के लिए निकल पड़े।

लक्ष्मण के जाते ही रावण एक वृद्ध ब्राह्मण साधु के वेश में भिक्षा मांगते हुए आश्रम में आया। सीता दुविधा में थीं वह कभी भी भिक्षा से इंकार नहीं कर सकती थीं और लेकिन उसे लक्ष्मण रेखा के भीतर रहने का आदेश दिया गया था। सीता ने अपने पास आने और भिक्षा लेने के लिए कहा लेकिन उसने दृढ़ता से मना कर दिया। वह अच्छी तरह जानता था कि वह सीमा पार नहीं कर पाएगा और इसलिए उसने सीता को इससे बाहर निकलने को कहा। अंत में सीता ने लक्ष्मण रेखा को पार करते हुए उसे भोजन कराया। रावण ने तुरंत अपना मूल रूप धारण कर लिया और सीता जिस पृथ्वी पर खड़ी थीं उसे अपने पुष्पक विमान में ले जाकर लंका की ओर प्रस्थान किया। एक बार वह सीता को अशोक वाटिका में ले आया जो एक सुखद वातावरण के साथ एक सुंदर बगीचा था। वहाँ उसने कई राक्षसों द्वारा संरक्षित सीता को बंधक बना लिया।

सीता रावण की बेटी थी?

इस कथा का एक और दिलचस्प पहलू है वेदवती एक पवित्र ब्राह्मण महिला वास्तव में देवी श्री महालक्ष्मी का मानव अवतार थीं। अपनी मानवीय अभिव्यक्ति में, वह हमेशा विष्णु से विवाह करना चाहती थीं। एक दिन जब वह नदी के किनारे ध्यान कर रही थीं रावण ने उन्हें देखा और उनकी उज्ज्वल सुंदरता से तुरंत प्रभावित हुआ। वह उसके पास गया और अपहरण करने की कोशिश की। उससे बचने के लिए वेदवती एक अग्निकुंड में कूद गई, जिसे मूल रूप से एक यज्ञ के लिए बनाया गया था। मरने से पहले वेदवती ने रावण को शाप दिया कि वह अपने अगले जन्म में उसकी मृत्यु के लिए जिम्मेदार होगी।

निश्चित रूप से अपने अगले जन्म में वह मंदोदरी और रावण की बेटी के रूप में पैदा हुई थी। श्राप को याद कर रावण ने बालक को समुद्र में फेंक दिया। वह भूमि देवी (धरती माता) को सौंपने से पहले देवी वरुणी की गोद में गिर गईं जिन्होंने तब उनकी देखभाल की। भूमि देवी ने उसे पृथ्वी के नीचे एक ताबूत में छिपा दिया और राजा जनक ने उसे खेत की जुताई करते हुए पाया।
हालांकि वाल्मीकि रामायण में सीता के मंदोदरी की बेटी होने का कोई उल्लेख नहीं है, महाकाव्य के कुछ अन्य संस्करण बताते हैं कि कैसे मंदोदरी की बेटी के रूप में पैदा हुई सीता रावण के विनाश और मृत्यु का कारण बन जाती हंै। अद्भुत रामायण के अनुसार, रावण अपने द्वारा मारे गए ऋषियों के खून को एक बर्तन में जमा करता था। अन्यत्र ऋषि समदा देवी लक्ष्मी को अपनी बेटी के रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या में थे। उन्होंने दुर्वा घास से दूध को एक बर्तन में संग्रहित किया और उसे मंत्रों से शुद्ध किया इस उम्मीद में कि लक्ष्मी उसमें निवास करेगी।

यह सब देखकर रावण ने इस दूध को अपने खून के घड़े में डाल दिया। इस बीच मंदोदरी ने रावण के कृत्यों से परेशान होकर आत्महत्या करने का फैसला किया। उसने उस घड़े से खून पिया मरने के बजाय वह लक्ष्मी के अवतार से गर्भवती हो गई। भयभीत मंदोदरी ने कुरुक्षेत्र में भू्रण को दफना दिया जहां राजा जनक ने बाद में उसे खोजा।

मूल महाकाव्य के कई और रूपांतर हैं जिनमें सीता को रावण और मंदोदरी की बेटी के रूप में वर्णित किया गया है। इन सभी संस्करणों में सीता को श्री लक्ष्मी के अवतार के रूप में वर्णित किया गया है जो राक्षस राजा को नष्ट करने के उद्देश्य के साथ पृथ्वी पर आए थे।

राम ने रावण का वध किया

राम ने निश्चय किया कि वह एक योद्धा की तरह रावण से लड़ेंगे उसे युद्ध में हरा देंगे और फिर सीता के साथ अयोध्या लौट आएंगे। युद्ध कांड जिसे लंका कांड के नाम से भी जाना जाता है, राम और रावण की सेनाओं के बीच युद्ध का विस्तार से वर्णन करता है। राम की वानरसेना ने लंका तक एक पुल बनाने में मदद की जिसके उपयोग से वे उस देश की सीमाओं को पार कर गए। रावण के पुत्र इंद्रजीत ने लक्ष्मण पर एक शक्तिशाली अस्त्र फेंका जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गये। हनुमान फिर संजीवनी बूटी को खोजने के लिए हिमालय पर सुमेरु पर्वत पर पहुंचे विशेष जड़ी बूटी की खोज में समय बर्बाद न करते हुए सुमेरु को उठाकर लंका ले आए। संजीवनी बूटी ने लक्ष्मण को वापस जीवित कर दिया और दोनों भाइयों ने रावण की सेना से लड़ना शुरू कर दिया।
युद्ध ने बहुत लोगों की जान ले ली और दोनों पक्षों को बहुत नुकसान हुआ। पराक्रमी इंद्रजीत भी युद्ध में मारा गया। अंत में राम और रावण आमने-सामने आ गए। राम ने राक्षस पर बाण के बाद बाण फेंका कोई फायदा नहीं हुआ।

राम और अधिक चिंतित हो उठे देवता भी, जो स्वर्ग से देख रहे थे उनमंे तनाव बढ़ने लगा कि दस सिर वाले रावण को कैसे रोका जाए। देवता इंद्र के पास पहुंचे फिर उन्होंने मातली द्वारा संचालित अपना दिव्य रथ भेजा उन्हें यकीन था कि उनका सारथी राम की मदद करेगा। राम इस रथ में चढ़ गए और रावण पर अस्त्र चलाने लगे। मातली ने राम को सर्वशक्तिमान ब्रह्मास्त्र परम हथियार का उपयोग करने का निर्देश दिया जो निश्चित रूप से लंका के शासक को नष्ट कर देगा। उन्होंने राम को यह भी याद दिलाया कि अमृत के स्थान पर रावण को नाभि के नीचे मारा जाना था तभी वह रावण को मार पाएंगे। राम ने ब्रह्मास्त्र का आह्वान किया शिव की पत्नी पार्वती के नाम का जाप किया और रावण की नाभि पर अस्त्र का लक्ष्य रखा। शक्तिशाली हथियार ने रावण के शरीर को छेद दिया जिससे जमीन पर गिर पड़ा और उसकी मृत्यु हो गई।

भगवान राम के हाथों मरने से रावण को स्वतः ही मोक्ष (मुक्ति) मिल गई। आखिरकार रावण एक महान विद्वान और एक बुद्धिमान और धर्मपरायण व्यक्ति था। यद्यपि उसने कुछ पाप किए थे यह केवल इसलिए था क्योंकि यह उसका असुर गुण था जो उस समय प्रकट हुआ था। साथ ही वह युद्ध के मैदान में वीरता से लड़ते हुए मारा गया था। इसलिए एक सच्चे योद्धा को सभी सम्मान के लिए रावण को एक उचित अंतिम संस्कार दिया गया था।

क्या रावण केवल एक किंवदंती था?

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कुछ लोगों का मानना है कि रामायण केवल अर्ध-कथा है, जो एक वास्तविक राजा के जीवन पर आधारित है, जिसने 2554 से 2517 ईसा पूर्व तक श्रीलंका पर शासन किया था। श्रीलंकाई किंवदंती के अनुसार शहर ने अपने कार्यकाल के दौरान बहुत सामाजिक-आर्थिक और वैज्ञानिक प्रगति की। इस शासक का राज्य ज्यादातर देश के पूर्वी और दक्षिणी कोनों के आसपास केंद्रित था। आखिरकार, कई वर्षों के बाद ऐसा माना जाता है कि यह समुद्र में खो गया है।

कई लोग यह भी कहते हैं कि रावण एक बौद्ध राजा था जो मुख्य रूप से कई मठों को बनाने के लिए जिम्मेदार था जो आज भी श्रीलंका में पाए जा सकते हैं, जैसे कि कुरागला और रहलगला। पूरा देश सीता एलिसा और नुमारा एलिसा जैसे स्थानों से भरा हुआ है माना जाता है कि ये वे स्थान हैं जहां सीता को बंदी बनाया गया था। इसके अलावा वारियापोला और हॉर्टन मैदान जैसे क्षेत्रों को उनके पुष्पक विमान की लैंडिंग साइट माना जाता है। श्रीलंका के दक्षिण में एक पर्वत शिखर रुमासाला को हिमालय पर्वतमाला का एक हिस्सा माना जाता है। माना जाता है कि औषधीय पौधों से भरे इस पर्वत को हनुमान इस स्थान पर लाए थे। बाद में राम और रावण के बीच युद्ध के दौरान लक्ष्मण के घातक घावों को ठीक करने के लिए संजीवनी के पौधे की खरीद के लिए हिमालय के लिए उड़ान भरी। माना जाता है कि युद्ध समाप्त होने के बाद उन्होंने पहाड़ छोड़ दिया था। आज तक इस पर्वत में विभिन्न प्रकार के औषधीय पौधे और जड़ी-बूटियाँ हैं।

एडम्स ब्रिज, चूना पत्थर की एक श्रृंखला, रामेश्वरम द्वीप को मन्नार द्वीप (श्रीलंका के उत्तर पश्चिमी तट से दूर) से जोड़ता है। यह सेतु जो आज भी अस्तित्व में है रावण की कथा से भी जुड़ा है। माना जाता है कि राम-सेतु या राम के पुल के रूप में भी जाना जाता है इसे बाद के पौराणिक वानरसेना द्वारा बनाया गया था जो राम को लंका पार करने में सक्षम बनाता है। दिलचस्प बात यह है कि इंडियन नेशनल रिमोट सेंसिंग एजेंसी द्वारा की गई जांच से संकेत मिलता है कि यह पुल मानव निर्मित था और इसका निर्माण 3500-5000 साल पहले हुआ होगा।

हालाँकि, कुछ श्रीलंकाई इतिहासकार इस दृष्टिकोण से असहमत हैं। उनके अनुसार इस पुल का निर्माण रावण ने किया था और यह एक तैरता हुआ ढांचा था जो श्रीलंका को भारत से जोड़ता था। वे आगे कहते हैं कि उसी पुल का इस्तेमाल बाद में राम ने लंकापुरी पार करने के लिए किया था। एक बार जब राम लंका की सीमाओं में प्रवेश कर गए तो उन्होंने विभीषण के साथ मिलकर सबसे महान शासकों में से एक को उखाड़ फेंका।

निष्कर्ष के तौर पर भले ही रावण वास्तव में अस्तित्व में था या नहीं तथ्य यह है कि इस राक्षस राजा की कहानी आकर्षक और विस्मयकारी दोनों हंै। 64 कलाओं में एक विशेषज्ञ उत्कृष्ट संगीतकार और ज्योतिषीय एक शक्तिशाली अतिमहारथी (योद्धा जो एक समय में कई योद्धाओं से लड़ा और परास्त कर सकता था एक सक्षम शासक और प्रशासक शिव का एक अटल भक्त जिसने अपना नाम स्वयं शिव से प्राप्त किया इस महान आत्मा के बारे में प्रशंसा करने के लिए वास्तव में बहुत सी चीजें हैं। एक साधक के रूप में उसकी प्रगति में उसका अहंकार आड़े आया। फिर भी हम में से कोई भी पूर्ण नहीं है हम सभी में बड़े और छोटे दोष हैं।
अपनी असफलताओं के बावजूद रावण स्वयं भगवान श्री महा विष्णु के अवतार के हाथों मोक्ष प्राप्त करने के लिए भाग्यशाली था। यह बिंदु उनकी सच्ची महानता और आध्यात्मिक शक्ति की गवाही देता है।

 

रावण कौन ब्राह्मण था?

सारस्वत ब्राह्मण।

रावण की ससुराल कहां थी?

जोधपुर।

रावण कौन जाति का था?

रावण सारस्वत ब्राह्मण जाति का था।

रावण कितने भाई थे?

रावण के दो सगे भाई विभीषण और कुम्भकर्ण थे और एक सौतेले भाई कुबेर थे। अतः रावण के तीन भाई थे।


रावण किसका पुत्र था?

रावण पुलस्त्य मुनि का पोता था और विश्वश्रवा ऋषि का पुत्र था।

रावण किसका अवतार था?

रावण विष्णु के द्वारपाल जय का अवतार था।

रावण का जन्म कहां हुआ?

रावण का जन्म बिसरख गांव (ग्रेटर नोएडा से १० किमी दूर) हुआ था।

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