गौ माता का शास्त्र पुराणों में माहात्मय

वृषभो को जगत् का पिता समझना चाहिये और गौएं संसार की माता हैं। उनकी पूजा करने से सम्पूर्ण पितरों और देवताओं की पूजा हो जाती है। जिनके गोबरसे लीपने पर सभा भवन, पौंसलेे, घर और देवमंदिर भी शुध्द हो जाते हैं, उन गौओ से बढकर और कौन प्राणी हो सकता है? जो मनुष्य एक साल तक स्वयं भोजन करने के पहले प्रतिदिन दूसरे की गाय को मुट्ठी भर घास खिलाया करता है, उसको प्रत्येक समय गौ की सेवा करने का फल प्राप्त होता है। (महाभारत, आश्वमेधिकपर्व, वैष्णवधर्म )

देवता, ब्राह्मण, गो, साधु और साध्वी स्त्रीयों के बल पर यह सारा संसार टिका हुआ है, इसी से वे परम पूजनीय हैं। गौए जिस स्थान पर जल पीती हैं, वह स्थान तीर्थ है। गंगा आदि पवित्र नदियाँ गोस्वरूपा ही हैं।

जहा जिस मार्ग से गो माताए जलराशि को लांघती हुई नदी आदि को पार करती है, वहां गंगा, यमुना, सिंधु, सरस्वती आदि नदियाँ या तीर्थ निश्चित रूप से विद्यमान रहते है।

गायके खुरसे उत्पन्न धूलि समस्त पापो को नष्ट कर देने वाली है। यह धूलि चाहे तीर्थ की हो चाहे मगध की कट आदि निकृष्ट देशों की ही क्यो न हो। इसमें विचार अथवा संदेह करने की कोई आवश्यकता नहीं। इतना ही नहीं वह सब प्रकार की मङ्गलकारिणी, पवित्र करने वाली और दुख दरिद्रता रूप अलक्ष्मी को नष्ट करने वाली है।

गायो के निवास करने से वहाँ की पृथ्वी भी शुद्ध हो जाती है। जहां गायें बैठती हैं वह स्थान, वह घर सर्वथा पवित्र हो जाता है। वहां कोई दोष नहीं रहता। उनके नि:श्वास की हवा देवताओं के लिये नीराज़न के समान है। गौओ को स्पर्श करना बडा पुण्यदायक है और उससे समस्त दु-स्वप्न, पाप आदि भी नष्ट हो जाते हैं। गौओ के गरदन और मस्तक के बीच साक्षात् भगवती गंगा का निवास है। गौएं सर्वदेेवमयी और सर्वतीर्थमयी हैं। उनके रोएँ भी बड़े ही पवित्रताप्रद और पुण्यदायक हैं। (विष्णुधर्मोत्तर पुराण, भगवान् हंस ब्राह्मणों से)

गौओ के शरीर को खुजलाने से या उनके शरीर के कीटाणुओ को दूर करने से मनुष्य अपने समस्त पापों को धो डालता है। गौओ को गोग्रास दान करने से महान् पुण्य की प्राप्ति होती है। गौओं को चराकर उन्हें जलाशय तक घुमाकर जल पिलाने से मनुष्य अनन्त वर्षो तक स्वर्ग मे निवास करता है। गौओ के प्रचारण के लिये गोचरभूमि की व्यवस्था कर मनुष्य नि:संदेह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है। गौओ के लिये गोशाला का निर्माण कर मनुष्य पूरे नगर का स्वामी बन जाता है और उन्हें नमक खिलाने से मनुष्य को महान सौभाग्य की प्राप्ति होती है। (विष्णुधर्मोत्तर पुराण, भगवान् हंस ब्राह्मणों से)

विपत्ति में या क्रीचड़ मे फंसी हुई या चोर तथा बाघ आदि के भय से व्याकुल गौ को क्लेश से मुक्त कर मनुष्य अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है। रुग्णावस्था मे गौओ को औषधि प्रदान करने से स्वयं मनुष्य सभी रोगों से मुक्त को जाता है। गौओ को भय से मुक्त करने पर मनुष्य स्वयं भी सभी भयो से मुक्त हो जाता है।

चांडाल के हाथ से गौ को खरीद लेने पर गोमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है तथा किसी अन्य के हाथ से गाय को खरीद कर उसका पालन करने से गोपालक को गोमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। गौओं की शीत तथा धूप से रक्षा करने पर स्वर्ग की प्राप्ति होती है। (विष्णुधर्मोत्तर पुराण, भगवान् हंस ब्राह्मणों से)

गोमूत्र, गोमय, गोदुग्ध, गोदधि, गोघृत और कुशोदक यह पञ्चगव्य स्नानीय और पेयद्रव्यों में परम पवित्र कहा गया है। ये सब मङ्गलमय पदार्थ भूत, प्रेत, पिशाच, राक्षस आदि से रक्षा करने वाले परम मङ्गल तथा कलि के दुख-दोषो को नाश करने वाले हैं। गोरोचना भी इसी प्रकार राक्षस, सर्प विष तथा सभी रोगों को नष्ट करने वाली एवं परम धन्य है। जो प्रात:काल उठकर अपना मुख गोघृत पात्र में रखे घी मे देखता है उसकी दुख: दरिद्रता सर्वदा के लिये समाप्त हो जाती है और फिर पाप का बोझ नहीं ठहरता।
(विष्णुधर्मोत्तर पुराण, राजनीति एवं धर्मशास्त्रके सम्यक ज्ञाता पुष्कर जी भगवान् परशुराम से)

गायो, गोकुल, गोमय आदि पर थूक-खखार नहीं छोड़ना चाहिये। (पुष्कर परशुराम संवाद)

जो गौओ के चलने के मार्ग में, चरागाह में जल की व्यवस्था करता है, वह वरुण लोक को प्राप्त कर वहां दस हजार वर्षों तक विहार करता है और जहां जहां उसका आगे जन्म होता है वह वहां सभी आनन्दो से परितृप्त रहता है। गोचरभूमि को हल आदि से जोतने पर चौदह इन्द्रों पर्यन्त भीषण नरक की प्राप्ति होती है। हे परशुराम जी! जो गौओ के पानी पीते समय विघ्न डालता है, उसे यही मानना चाहिये कि उसने घोर ब्रह्महत्या की। सिंह, व्याघ्र आदि के भय से डरी हुई गाय की जो रक्षा करता है और कीचड़ में फंसी हुई गाय का जो उद्धार करता है, वह कल्प पर्यन्त स्वर्ग में स्वर्गीय भोगो का भोग करता है। गायों को घास प्रदान करने से वह व्यक्ति अगले जन्म मे रूपवान हो जाता है और उसे लावण्य तथा महान सौभाग्य की प्राप्ति होती है। (पुष्कर परशुराम संवाद)

हे परशुरामजी! गायों को बेचना भी कल्याणकारी नहीं है। गायों का नाम लेने से भी मनुष्य पापो से शुद्ध हो जाता है। गौओ का स्पर्श सभी पापों का नाश करने वाला तथा सभी प्रकार का सौभाग्य एवं मङ्गल का विधायक है। गौओ का दान करने से अनेक कुलों का उद्धार को जाता है।

मातृकुल, पितृकुल और भार्याकुल मे जहां एक भी गो माता निवास करती है वहां रजस्वला और प्रसूतिका आदिकी अपवित्रता भी नहीं आती और पृथ्वी में अस्थि, लोहा होने का, धरती के आकार प्रकार की विषमता का दोष भी नष्ट हो जाता है। गौओ के श्वास प्रश्वास से घर मे महान् शान्ति होती है। सभी शास्त्रो में गौओ के श्वास प्रश्वास को महानीराजन कहा गया है। हे परशुराम! गौओ को छु देने मात्र से मनुष्यों के सारे पाप क्षीण हो जाते हैं। (पुष्कर परशुराम संवाद)

जिसको गाय का दूध, दही और घी खाने का सौभाग्य नहीं प्राप्त होता, उसका शरीर मल के समान है। अन्न आदि पाँच रात्रि तक, दूध सात रात्रि तक, दही बीस रात्रि तक और घी एक मास तक शरीर मे अपना प्रभाव रखता है। जो लगातार एक मास तक बिना गव्यका (बिना गौ के दूध से उत्पन्न पदार्थ) भोजन करता है उस मनुष्यके भोजन में प्रेतों को भाग मिलता है, इसलिये प्रत्येक युुग में सब कार्यों के लिये एकमात्र गौ ही प्रशस्त मानी गयी है। गौ सदा और सब समय धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चारों पुरुषार्थ प्रदान करनेवाली है। (पद्मपुराण, ब्रह्माजी और नारद मुनि संवाद)

गायो से उत्पन्न दूध, दही, घी, गोबर, मूत्र और रोचना- ये छ: अङ्ग (गोषडङ्ग) अत्यन्त पवित्र हैं और प्राणियों के सभी भापों को नष्ट कर उन्हें शुद्ध करने वाले हैं। श्री सम्पन्न बिल्व वृक्ष गौओ के गोबर से ही उतपन्न हुआ है। यह भगवान् शिवजी को अत्यन्त प्रिय है। चूँकि उस वृक्ष में पद्महस्ता भगवती लक्ष्मी साक्षात् निवास करती हैं, इसीलिये इसे श्री वृक्ष भी कहा गया है। बाद में नीलकमल एवं रक्त कमलके बीज भी गोबर से ही उत्पन्न हुए थे। गौओ के मस्तक से उत्पन्न परम पवित्र गोरोचना है समस्त अभीष्टो की सिद्धि करने वाली तथा परम मङ्गलदायिनी है।

अत्यन्त सुगन्धित गुग्गुल नामका पदार्थ गौओ के मूत्र से ही उत्पन्न हुआ है। यह देखने से भी कल्याण करता है। यह गुग्गुल सभी देवताओं का आहार है, विशेष रूप भगवान् शंकर का प्रिय आहार है। संसार के सभी मङ्गलप्रद बीच एवं सुन्दर से सुन्दर आहार तथा मिष्टान्न आदि सब के सब गौ के दूध से ही बनाये जाते हैं। सभी प्रक्रार की मङ्गल कामनाओ को सिद्ध करने के लिये गाय का दही लोकप्रिय है। देवताओ को तृप्त करने वाला अमृत नामक पदार्थ गाय के घी से ही उत्पन्न हुआ है। (भविष्यपुराण, उत्तरपर्व, अ.६९, भगवान् श्रीकृष्ण युधिष्ठीर संवाद)

गौओ को खुजलाना तथा उन्हें स्नान कराना भी गोदान के समान फल वाला होता है। जो भय से दुखी (भयग्रस्त) एक गाय की रक्षा करता है, उसे सौं गोदान का फल प्राप्त होता है। पृथ्वी में समुद्र से लेकर जितने भी बड़े तीर्थ-सरिता-सरोवर आदि हैं, वे सब मिलकर भी गौ के सींग के जल से स्नान करने के षोडशांश के तुल्य भी नहीं होते। (बृहत्पराशर स्मृति, अध्याय ५)

राम-वनवास के समय भरत १४ वर्ष तक इसी कारण स्वस्थ रहकर आध्यात्मिक उन्नति करते रहे, क्योंकि वे अन्न के साथ गोमूत्र का सेवन करते थे।

गोमूत्रयावकं श्रुत्वा भ्रातरं वल्कलाम्बरम्।।
(श्रीमद्भागवत ९ । १० । ३४)

गोमाताका दर्शन एवं उन्हें नमस्कार करके उनकी परिक्रमा करे। ऐसा करने से सातों द्विपो सहित भूमण्डल की प्रदक्षिणा हो जाती है। गौएँ समस्त प्राणियो की माताएँ एवं सारे सुख देने वाली हैं। वृद्धि की आकांक्षा करने वाले मनुष्य को नित्य गो माताओ की प्रदक्षिणा करनी चाहिये।

जिस व्यक्ति कें पास श्राद्ध के लिये कुछ भी न हो वह यहि पितरो का ध्यान करके गो माता को श्रद्धापूर्वक घास खिला दे तो उसको श्राद्ध का फल मिल जाता है। (निर्णयसिंधुु)

गौ माताए समस्त प्राणियों की माता हैं और सारे सुखों को देने वाली हैं, इसलिये कल्याण चाहने वाले मनुष्य सदा गोओं की प्रदक्षिणा करें। गौओ को लात न मारे। गौओ के बीच से होकर न निकले। मङ्गलकी आधार भूत गो-देवियों की सदा पूजा को। (महा, अनु ६९, ७-८)

जब गौए चर रही हों या एकांत में बैठी हों, तब उन्हें तंग न करें। प्यास से पीडित होकर जब भी क्रोध से अपने स्वामी की ओर देखती है तो उसका बंधुबांधवोसहित नाश हो जाता है। राजाओ को चाहिये कि गोपालन और गोरक्षण करे। उतनी ही संख्या मे गाय रखे, जितनी का अच्छी तरह भरण-पोषण हो सके। गाय कभी भी भूख से पीडित न रहे, इस बात पर विशेष ध्यान रखना चाहिये।

जिसके घर में गाय भूख से व्याकुल होकर रोती है, वह निश्चय ही नरक में जाता है। जो पुरुष गायों के घर में सर्दी न पहुँचने का और जल के बर्तन को शुद्ध जल से भर रखने का प्रबन्ध कर देता है, वह ब्रह्मलोक मे आनन्द भोग करता है।

जो मनुष्य सिंह, बाघ अथवा और किसी भय से डरी हुई, कीचड़ में धसी हुई या जल में डूबती हुई गाय को बचाता है वह एक कल्पतक स्वर्ग-सुख का भोग करता है। गाय की रक्षा, पूजा और पालन अपनी सगी माता के समान करना चाहिये। जो मनुष्य गायों को ताड़ना देता है, उसे रौरव नरक की प्राप्ति होती है। (हेभाद्रि)

गोबर और गोमूत्र से अलक्ष्मी का नाश होता है, इसलिये उनसे कभी घृणा न करे। जिसके घर में प्यासी गाय बंधी रहती है, रजस्वला कन्या अविवाहिता रहती है और देवता बिना पूज़न के रहते हैं, उसके पूर्वकृत सारे पुण्य नष्ट हो जाते हैं। गायें जब इच्छानुसार चरती होती हैं, उस समय जो मनुष्य उन्हें रोकता है, उसके पूर्व पितृगण पतनोन्मुख होकर काँप उठते हैं। जो मनुष्य मूर्खतावश गायों को लाठी से मारते हैं उनको बिना हाथ के होकर यमपुरी में जाना पड़ता है। (पद्मपुराण, पाताल अ १८)

गाय को यथायोग्य नमक खिलाने से पवित्र लोक की प्राप्ति होती है और जो अपने भोजन से पहले गाय को घास चारा खिलाकर तृप्त करता है, उसे सहस्त्र गोदान का फल मिलता है। (आदित्यपुराण)

अपने माता पिता की भांती श्रद्धापूर्वक गायों का पालन करना चाहिये। हलचल, दुर्दिन और विप्लव के अवसर पर गायों को घास और शीतल जल मिलता रहे, इस बात का प्रबन्ध करते रहना चाहिये। (ब्रह्मपुराण)

गोमाता का दर्शन एवं उन्हें नमस्कार करके उनकी परिक्रमा करे। ऐसा करने से सातों द्विपो सहित भूमण्डल की प्रदक्षिणा हो जाती है। गौएँ समस्त प्राणियो की माताएँ एवं सारे सुख देने वाली हैं। वृद्धि की आकांक्षा करने वाले मनुष्य को नित्य गो माताओ की प्रदक्षिणा करनी चाहिये।

जिस व्यक्ति कें पास श्राद्ध के लिये कुछ भी न हो वह यहि पितरो का ध्यान करके गो माता को श्रद्धापूर्वक घास खिला दे तो उसको श्राद्ध का फल मिल जाता है। (निर्णयसिंधुु)

महर्षि वसिष्ठ जी ने अनेक प्रकार से गो माता की महिमा तथा उनके दान आदि की महिमा बताते हुए मनुष्यो के लिये एक महत्त्वपूर्ण उपदेश तथा एक मर्यादा स्थापित करते हुए कहा –

नाकीर्तयित्वा गा: सुप्यात् तासां संस्मृत्य चोत्पतेत्। सायंप्रातर्नमस्येच्च गास्तत: पुष्टिमाप्नुयात्।।
गाश्च संकीर्तयेन्नित्यं नावमन्येेत तास्तथा। अनिष्ट स्वप्नमालक्ष्य गां नर: सम्प्रकीर्तयेत्।।
(महाभा, अनु ७८। १६, १८)

अर्थात् गौओ का नाम कीर्तन किये बिना न सोये। उनका स्मरण करके ही उठे और सबेरे-शाम उन्हें नमस्कार करे। इससे मनुष्य को बल और पुष्टि प्राप्त होती है। प्रतिदिन गायो का नाम ले, उनका कभी अपमान न को। यदि बुरे स्वप्न दिखायी दें तो मनुष्य गो माता का नाम ले।

इसी प्रकार वे आगे कहते हैं की जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक रात-दिन निम्न मन्त्र का बराबर कीर्तन करता है वह सम अथवा विषम किसी भी स्थिति में भय से सर्वथा मुक्त हो जाता है और सर्वदेवमयी गोमाता का कृपा पात्र बन जाता है।

मन्त्र इस प्रकार है –

गा वै पश्याम्यहं नित्यं जाब: पश्यन्तु मां सदा ।
गावोsस्माकं वयं तासां यतो गावस्ततो वयम्।।
(महाभा, अनु ७८ । २४)

अर्थात् मैं सदा गौओका दर्शन करू और गौए मुझपर कृपा दृष्टि करें । गौए हमारी हैं और हम गौओकै हैं । जहां गौए रहें, वहीं हम रहें, चूँकी गौए हैं इसीसे हमलोग भी हैं।

गाय को सपने में देखने के अर्थ

स्वप्न में गौ अथवा वृषभ के दर्शन से कल्याण लाभ एवं व्याधि नाश होता है । इसी प्रकार स्वप्न मे गौ के थन को चूसना भी श्रेष्ठ माना पाया है। स्वप्न मे गौका घर में ब्याना, वृषभ की सवारी करना, तालाब के बीच में घृत मिश्रित खीर का भोजन भी उत्तम माना गया है। घी सहित खीर का भोजन तो राज्य प्राप्ति का सूचक माना गया है।

इसी प्रकार स्वप्न में ताजे दुहे हुए फेन सहित दुग्ध का पान करने वाले को अनेक भोगो की तथा दही के देखने से प्रसन्नता की प्राप्ति होती है। जो वृषभ से युक्त रथ पर स्वप्न में अकेला सवार होता है और उसी अवस्था में जाग जाता है, उसे शीघ्र धन मिलता है। स्वप्न में दही मिलने से धन की, घी मिलने से यश की और दही खाने से भीे यश की प्राप्ति निश्चित है।

यात्रा आरम्भ करते समय दही और दूध का दिखना शुभ शकुन माना गया है। स्वप्न में दही भात का भोजन करने से कार्य सिद्धि होती है तथा बैल पर चढ़ने से द्रव्य लाभ होता है एवं व्याधिसे छुटकारा मिलता है। इसी प्रकार स्वप्र मे वृषभ अथवा गौ का दर्शन करने से कुटुम्ब की वृद्धि होती है। स्वप्न मे सभी काली वस्तुओ का दर्शन निन्द्य माना गया है, केवल कृष्णा गौ का दर्शन शुभ होता है।

Dr Vijay Shankar Mishr
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