प्रदोष व्रत की कथा, पूजा की विधि और इसका महत्व क्या है?

भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए भक्त कई पूजा विधान और व्रत करते है जैसे की कांवड़ यात्रा, अमरनाथ यात्रा, सावन के व्रत, भगवान शिव के लिए सोमवार के व्रत या फिर शिवलिंग पर जल चढ़ाना इत्यादि। अगर देखा जाये तोह भगवान शिव को प्रदोष के व्रत अत्यधिक प्रिय है, इन व्रत के माध्यम से भक्त भगवान शिव को प्रसन्न कर सकते है।

प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat)

प्रत्येक माह की त्रयोदशी को प्रदोष होता है और यह व्रत हर माह दो बार आता है। हिन्दू धर्म में एकादशी को भगवान विष्णु से जोड़ा जाता है और त्रयोदशी के प्रदोष व्रत को भगवान शिव से जोड़के देखा जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुशार एक वर्ष में यह व्रत कुल चौबीस बारे आता है।

हिन्दू ग्रंथो में होली से पूर्व आने वाले प्रदोष व्रत का अलग ही महत्व है। फाल्गुन पूर्णिमा जिसे होलिका दहन के नाम से भी जानते है,  उससे पूर्व आने वाले प्रदोष व्रत का अलग ही महत्व बताया गया है।

प्रदोष व्रत कथा (Pradosh Vrat Katha)

pradosh vrat

प्रदोष व्रत का नाम प्रदोष क्यों पड़ा? इसके पीछे भी एक प्राचीन रोचक कथा है। ऐसा कहा जाता है की एक बार की बात है, जब चंद्र देवता क्षय रोग से पीड़ित थे तो उन्होंने भगवान शिव से अपने दोषो को दूर करने की प्रार्थना की और भगवान शिव ने उनके रोगो को त्रयोदशी के दिन ही दूर किया था। इसी दिन चंद्र देव के सब दोष दूर हुए और उनको पुनः जीवन मिला था।

स्कन्द पुराण के अनुसार

स्कन्द पुराण के अनुसार अत्यंत प्राचीन काल में एक वृद्ध विधवा ब्राह्मण स्त्री थी, जो अपने पुत्र के साथ एक गाँव में रहती थी। वह औरत प्रतिदिन अपने पुत्र के साथ पास के राज्य में भिक्षा मांगने जाती थी। एक दिन जब वह भिक्षाटन कर लौट रही थी तो रास्ते में नदी किनारे उसको एक सुंदर बालक दिखाई दिया, जो विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त था। दुश्मनों ने उसके पिता की हत्या कर उसका राज्य हड़प लिया था और उसकी माता की भी अकाल मृत्यु हो चुकी थी। गरीब ब्राह्मणी ने उस बालक को अपना लिया और उसका पालन-पोषण किया।

जब कुछ समय बीत गया तो वह स्त्री दोनों बालको को लेकर मंदिर में देव दर्शन के लिया गयी जय उसकी मुलाकात महर्षि शांडिल्य से हुई। महर्षि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को बताया कि जो बालक उसको मिला है वह विदर्भ राज्य के राजा का पुत्र है जो युद्ध में मारे जा चुके हैं और उसकी माता को भी जंगली जानवर मारकर अपना भोजन बना चुका है। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। ऋषि आज्ञा से ब्राह्मणी के साथ दोनों बालकों ने भी प्रदोष व्रत करना शुरू किया।

दोनों बच्चे प्रदोष का व्रत रखने लगे, और उस व्रत के फलस्वरूप एक दिन जब दोनों युवा जंगल में कंद मूल इकट्ठे कर रहे थे तो उनकी मुलाकात एक गंधर्व राजकुमारी अंशुमति से हुई। तब वह राजकुमारी राजकुमार धर्मगुप्त पर मोहित हो गयी और अपने पिता गंधर्व राज से विवाह की इच्छा जताई। जब गंधर्व राज धर्मगुप्त से मिले तो उन्होंने बताया की वे विदर्भ के राजकुमार है और अपनी पूरी कहानी बताई। इसके पश्चात गंधर्व राज ने भगवान शिव के आशीर्वाद से अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार के साथ कर दिया। ततपश्चान राजकुमार ने गंधर्व सेना की मदद से विदर्भ पर पुनः शासन हाशिल कर लिया।

वहां उस महल में वह ब्राह्मणी और उसके पुत्र को आदर के साथ ले आया और अपने साथ रखने लगा। ब्राह्मणी और उसके पुत्र के सभी दुख और गरीबी दूर हो गई और वे सुख से अपना जीवन व्यतीत करने लगे। एक दिन अंशुमती ने राजकुमार से इन सभी बातों के पीछे की वजह और रहस्य पूछा, तब राजकुमार ने अंशुमती को अपने जीवन की पूरी कथा बताई और साथ ही प्रदोष व्रत का महत्व और व्रत से प्राप्त फल से भी अवगत कराया।

पद्म पुराण के अनुसार

पद्म पुराण की एक कथा के अनुसार चंद्रदेव जबअपनी 27 पत्नियों में से सिर्फ एक रोहिणी से ही सबसे ज्यादा प्यार करते थे और बाकी 26 को उपेक्षित रखते थे जिसके चलते उन्हें श्राप दे दिया था जिसके चलते उन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। ऐसे में अन्य देवताओं की सलाह पर उन्होंने शिवजी की आराधना की और जहां आराधना की वहीं पर एक शिवलिंग स्थापित किया। शिवजी ने प्रसन्न होकर उन्हें न केवल दर्शन दिए बल्कि उनका कुष्ठ रोग भी ठीक कर दिया। चन्द्रदेव का एक नाम सोम भी है। उन्होंने भगवान शिव को ही अपना नाथ-स्वामी मानकर यहां तपस्या की थी इसीलिए इस स्थान का नाम ‘सोमनाथ’ हो गया।

प्रदोष व्रत विधि (Pradosh Vrat Vidhi)

प्रदोष व्रत पूजन सामग्री 

एक जल से भरा हुआ कलश, एक थाली (आरती के लिए), बेलपत्र, धतूरा, भांग, कपूर, सफेद पुष्प व माला, आंकड़े का फूल, सफेद मिठाई, सफेद चंदन, धूप, दीप, घी, सफेद वस्त्र, आम की लकड़ी, हवन सामग्री।

कैसे करे प्रदोष व्रत का पूजन

रवि प्रदोष व्रत के दिन व्रतधारी को प्रात:काल नित्य कर्मों से निवृत्त होकर स्नानादि कर शिवजी का पूजन करना चाहिए। प्रदोष वालों को इस पूरे दिन निराहार रहना चाहिए तथा दिनभर मन ही मन शिव का प्रिय मंत्र ‘ॐ नम: शिवाय’ का जाप करना चाहिए। तत्पश्चात सूर्यास्त के पश्चात पुन: स्नान करके भगवान शिव का षोडषोपचार से पूजन करना चाहिए।

रवि प्रदोष व्रत की पूजा का समय शाम 4.30 से शाम 7.00 बजे के बीच उत्तम रहता है, अत: इस समय पूजा की जानी चाहिए। नैवेद्य में जौ का सत्तू, घी एवं शकर का भोग लगाएं, तत्पश्चात आठों दिशाओं में 8‍ दीपक रखकर प्रत्येक की स्थापना कर उन्हें 8 बार नमस्कार करें। इसके बाद नंदीश्वर (बछड़े) को जल एवं दूर्वा खिलाकर स्पर्श करें। शिव-पार्वती एवं नंदकेश्वर की प्रार्थना करें।

रवि प्रदोष व्रत के मंत्र

मंत्र- ‘ॐ नम: शिवाय’ अथवा शिव का विशेष मंत्र – ‘शिवाय नम:’ का कम से कम 108 बार जप करें।

प्रदोष व्रत विधान

सूत जी ने कहा है प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी के व्रत को प्रदोष व्रत कहते हैं। सूर्यास्त के पश्चात रात्रि के आने से पूर्व का समय प्रदोष काल कहलाता है। इस व्रत में महादेव भोले शंकर की पूजा की जाती है। इस व्रत में व्रती को निर्जल रहकर व्रत रखना होता है। प्रात: काल स्नान करके भगवान शिव की बेल पत्र, गंगाजल, अक्षत, धूप, दीप सहित पूजा करें। संध्या काल में पुन: स्नान करके इसी प्रकार से शिव जी की पूजा करना चाहिए। इस प्रकार प्रदोष व्रत करने से व्रती को पुण्य मिलता है।

प्रदोष व्रत में क्या खाना चाहिए

  • प्रदोष काल में उपवास में सिर्फ हरे मूंग ही खाने चाहिए, ऐसी मान्यता है की, हरा मूंग पृथ्‍वी तत्व है और मंदाग्नि को शांत रखता है।
  • प्रदोष व्रत में लाल मिर्च, अन्न, चावल और नमक नहीं खाना चाहिए।
  • प्रदोष व्रत में पूर्ण उपवास या फलाहार रखना सबसे उचित मन गया हैं।

इस दिन प्रदोष व्रतार्थी को नमकरहित भोजन करना चाहिए। यद्यपि प्रदोष व्रत प्रत्येक त्रयोदशी को किया जाता है, परंतु विशेष कामना के लिए वार संयोगयुक्त प्रदोष का भी बड़ा महत्व है। अत: जो लोग अपने स्वास्थ्य को लेकर हमेशा परेशान रहते हैं, किसी न किसी बीमारी से ग्रसित होते रहते हैं, उन्हें रवि प्रदोष व्रत अवश्य करना चाहिए।

प्रदोष व्रत का महत्व

प्रदोष व्रत कलियुग में अति मंगलकारी और शिव कृपा प्रदान करने वाला है। स्त्री अथवा पुरूष जो भी अपना कल्याण चाहते हों यह व्रत रख सकते हैं। प्रदोष व्रत को करने से हर प्रकार का दोष मिट जाता है। सप्ताह के सातों दिन के प्रदोष व्रत का अपना विशेष महत्व है

  • रविवार के दिन प्रदोष व्रत आप रखते हैं तो सदा नीरोग रहेंगे
  • सोमवार के दिन व्रत करने से आपकी इच्छा फलित होती है
  • मंगलवार को प्रदोष व्रत रखने से रोग से मुक्ति मिलती है और आप स्वस्थ रहते हैं।
  • बुधवार के दिन इस व्रत का पालन करने से सभी प्रकार की कामना सिद्ध होती है।
  • बृहस्पतिवार के व्रत से शत्रु का नाश होता है।
  • शुक्र प्रदोष व्रत से सभाग्य की वृद्धि होती है।
  • शनि प्रदोष व्रत से पुत्र की प्राप्ति होती है।

इस व्रत के महात्म्य को गंगा के तट पर किसी समय वेदों के ज्ञाता और भगवान के भक्त श्री सूत जी ने सनकादि ऋषियों को सुनाया था। सूत जी ने कहा है कि कलियुग में जब मनुष्य धर्म के आचरण से हटकर अधर्म की राह पर जा रहा होगा, हर तरफ अन्याय और अनचार का बोलबाला होगा। मानव अपने कर्तव्य से विमुख हो कर नीच कर्म में संलग्न होगा उस समय प्रदोष व्रत ऐसा व्रत होगा जो मानव को शिव की कृपा का पात्र बनाएगा और नीच गति से मुक्त होकर मनुष्य उत्तम लोक को प्राप्त होगा।

शास्त्रों का कथन है कि प्रदोष व्रत करने से भगवान शिव की कृपा जल्दी ही प्राप्त होती है। जिससे हर तरह के सुख, समृद्धि, भोग और ऐश्वर्य मिलता है। इसके साथ ही वैवाहिक जीवन में सुख बढ़ता है और लंबी उम्र के साथ अच्छी सेहत भी मिलती है।

सूत जी ने सनकादि ऋषियों को यह भी कहा कि प्रदोष व्रत से पुण्य से कलियुग में मनुष्य के सभी प्रकार के कष्ट और पाप नष्ट हो जाएंगे। यह व्रत अति कल्याणकारी है, इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य को अभीष्ट की प्राप्ति होगी। इस व्रत में अलग अलग दिन के प्रदोष व्रत से क्या लाभ मिलता है यह भी सूत जी ने बताया। सूत जी ने सनकादि ऋषियों को बताया कि इस व्रत के महात्मय को सर्वप्रथम भगवान शंकर ने माता सती को सुनाया था। मुझे यही कथा और महात्मय महर्षि वेदव्यास जी ने सुनाया और यह उत्तम व्रत महात्म्य मैने आपको सुनाया है।

Pandit Balkrishna Sharma Shastri
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